यूक्रेन के बाद रूस का नया टारगेट कौन? जानें कौन-कौन से देश खतरे में?
यूक्रेन युद्ध के बाद अब दुनिया में यह सवाल उठ रहा है कि रूस का अगला टारगेट कौन होगा? व्लादिमीर पुतिन पहले ही कई बार संकेत दे चुके हैं कि वह सोवियत संघ के विघटन को रूस के लिए सबसे बड़ी भू-राजनीतिक त्रासदी मानते हैं। ऐसे में रूस उन देशों पर नजर गड़ाए बैठा है, जहां रूसी-भाषी आबादी बड़ी संख्या में रहती है।

तीन साल पहले जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तो पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया। तीसरे विश्व युद्ध की आशंका जताई जाने लगी। हालांकि, युद्ध लंबा खिंच गया और अब जाकर सीजफायर की चर्चाएं हो रही हैं, वो भी अमेरिका की अगुवाई में। लेकिन इस संघर्ष से एक बड़ा सवाल उठा—क्या रूस केवल यूक्रेन पर ही आक्रामक था, या फिर उसकी नजर अन्य रूसी-भाषी देशों पर भी है?
यूक्रेन पर क्यों हमला हुआ? रूस की मंशा क्या थी?
रूस और यूक्रेन का संबंध सिर्फ दो देशों का मामला नहीं है, बल्कि यह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के उस सपने का हिस्सा है, जिसमें वह सोवियत संघ (USSR) के बिखरने को "सबसे बड़ी भू-राजनीतिक त्रासदी" मानते हैं। 1991 में जब सोवियत संघ टूटा, तो उससे 15 स्वतंत्र देश बने, जिनमें यूक्रेन, बेलारूस, कजाकिस्तान, मोल्दोवा और बाल्टिक राष्ट्र (एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया) शामिल थे। यूक्रेन हमेशा से रूस के लिए सबसे महत्वपूर्ण रहा है। ऐतिहासिक रूप से, रूसी सभ्यता की जड़ें कीव (यूक्रेन की राजधानी) में मानी जाती हैं। इसके अलावा, यह रूस के लिए एक रणनीतिक दीवार का भी काम करता है, जो उसे पश्चिमी देशों और नाटो (NATO) से बचाता है।
लेकिन जब यूक्रेन ने यूरोपीय यूनियन (EU) और NATO के करीब जाने की कोशिश की, तो रूस इसे अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानने लगा। यही वजह थी कि 2014 में उसने क्रीमिया पर कब्जा किया और 2022 में उसने पूरे यूक्रेन पर हमला कर दिया।
रूस की नजर अब किन देशों पर?
यूक्रेन के बाद, अब सवाल यह उठता है कि क्या रूस की भूख यहीं खत्म हो जाएगी, या फिर उसके अगले निशाने पर कोई और देश होगा? विशेषज्ञों के अनुसार, रूस उन देशों पर नजर रखे हुए है जहां रूसी भाषा बोलने वाले लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। ये देश पहले सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके हैं और रूस के प्रभाव में आने की संभावना रखते हैं। आइए जानते हैं वे कौन-कौन से देश हो सकते हैं।
1. मोल्दोवा (Moldova)
मोल्दोवा एक छोटा लेकिन संवेदनशील देश है, जो यूक्रेन की पश्चिमी सीमा से लगा हुआ है। इस देश में एक अलगाववादी क्षेत्र है जिसे ट्रांसनिस्ट्रिया (Transnistria) कहा जाता है, जहां रूसी समर्थक गुट पहले से ही सक्रिय हैं। यहां की लोकल सरकार मास्को के प्रति निष्ठावान है और पहले भी कई बार रूस से मदद की अपील कर चुकी है। अगर यूक्रेन युद्ध में कमजोर पड़ता है, तो रूस के लिए मोल्दोवा पर दबाव बनाना बेहद आसान हो जाएगा।
2. बेलारूस (Belarus)
बेलारूस आधिकारिक तौर पर स्वतंत्र है, लेकिन उसकी विदेश नीति पूरी तरह से मॉस्को के इशारे पर चलती है। राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको, पुतिन के सबसे करीबी माने जाते हैं और उन्होंने रूस को अपने देश में सैनिक ठिकाने बनाने की अनुमति दी है। अगर रूस को जरूरत पड़ी, तो बेलारूस को पूरी तरह से अपने में समाहित करने में उसे कोई दिक्कत नहीं होगी।
3. कजाकिस्तान (Kazakhstan)
कजाकिस्तान रूस के बाद सोवियत संघ से बना दूसरा सबसे बड़ा देश है। इसकी उत्तरी सीमा पर बड़ी संख्या में रूसी मूल के लोग रहते हैं, जो कभी-कभी खुद को रूस से ज्यादा जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। हाल ही में रूस समर्थक नेताओं ने कजाकिस्तान के कुछ हिस्सों पर दावा भी किया था। अगर कजाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है, तो रूस अपनी "रूसियों की सुरक्षा" के नाम पर यहां भी हस्तक्षेप कर सकता है।
4. बाल्टिक देश – रूस से सीधा टकराव?
एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया तीन छोटे लेकिन महत्वपूर्ण देश हैं, जो नाटो (NATO) के सदस्य हैं। इन देशों में भी बड़ी रूसी-भाषी आबादी रहती है, लेकिन इन पर हमला करना रूस के लिए सीधा नाटो से युद्ध छेड़ने जैसा होगा। हालांकि, रूस इन देशों में साइबर अटैक, फेक न्यूज और आंतरिक अस्थिरता बढ़ाने जैसी रणनीति अपना सकता है, जिसे "हाइब्रिड वॉर" कहा जाता है।
रूस का अगला कदम क्या होगा?
यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि रूस केवल सैन्य ताकत से ही नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी आगे बढ़ता है। वह किसी भी देश पर सीधे हमला करने की बजाय, वहां के रूसी-समर्थक गुटों को उकसाने, सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कराने और अलगाववादी आंदोलनों को बढ़ावा देने की नीति अपनाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रूस यूक्रेन में अपने उद्देश्यों को पूरा कर लेता है, तो वह मोल्दोवा और कजाकिस्तान जैसे कमजोर देशों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करेगा।
अमेरिका और यूरोपीय देश पहले ही रूस पर कड़े प्रतिबंध लगा चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद रूस की आक्रामकता में कोई कमी नहीं आई। NATO ने यूक्रेन को मदद दी है, लेकिन वह सीधे युद्ध में शामिल होने से बचता रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अगर रूस आगे बढ़ता है, तो क्या अमेरिका और यूरोप इस बार उसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाएंगे या फिर यूक्रेन की तरह दूसरे देश भी उसकी ताकत के आगे झुकने को मजबूर होंगे।
रूस का अगला कदम क्या होगा, यह पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। यूक्रेन युद्ध ने यह साफ कर दिया कि पुतिन सोवियत संघ की पुरानी सीमाओं को फिर से बनाना चाहते हैं। लेकिन क्या यह इतना आसान होगा?
अगर यूक्रेन पूरी तरह से हार जाता है, तो रूस के लिए मोल्दोवा, कजाकिस्तान और अन्य रूसी-भाषी देश अगला आसान शिकार बन सकते हैं। लेकिन अगर पश्चिमी देश सख्त कदम उठाते हैं, तो यह पुतिन के लिए मुश्किल भी हो सकता है।
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