क्या अकबर मुसलमानों की पहचान के लिए खतरा था? पाकिस्तान ऐसा क्यों मानता है?
भारत में अकबर को महान सम्राट और न्यायप्रिय शासक माना जाता है, लेकिन पाकिस्तान में उनकी नीतियों की निंदा की जाती है। वहां की इतिहास की किताबों में अकबर को हिंदुओं और मुसलमानों के बीच समानता लाने वाला शासक बताया गया है, जिससे इस्लामिक पहचान को खतरा हुआ।

भारत में जब भी महान सम्राटों की बात होती है, तो अकबर का नाम सम्मान से लिया जाता है। लेकिन पाकिस्तान में हालात इसके बिल्कुल उलट हैं। वहाँ की इतिहास की किताबों और आम जनमानस में अकबर को लेकर नफरत देखी जाती है, जबकि औरंगजेब को एक आदर्श शासक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह सोच पाकिस्तान की स्कूली शिक्षा प्रणाली और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से जुड़ी हुई है, जिसे जानकर कोई भी हैरान रह सकता है। आइए, इस विषय को विस्तार से समझते हैं।
पाकिस्तान में विवादित अकबर
भारत में अकबर को एक न्यायप्रिय और धार्मिक सहिष्णु शासक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया, गैर-मुसलमानों से जज़िया कर हटाया, और अपने दरबार में सभी धर्मों के विद्वानों को स्थान दिया। इसके विपरीत, पाकिस्तान की किताबों में अकबर की छवि नकारात्मक रूप में पेश की गई है। वहाँ उन्हें एक ऐसा शासक बताया गया है, जिसने इस्लामिक पहचान को कमजोर किया।
पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली ने अपने शोध पत्र ‘अकबर इन पाकिस्तानी टेक्स्टबुक्स’ (1992) में लिखा कि पाकिस्तान की स्कूली और अकादमिक किताबों में अकबर की आलोचना इसलिए की जाती है क्योंकि उसने हिंदू और मुस्लिम दोनों के प्रति समान रवैया अपनाया। इसे इस्लामिक मूल्यों के लिए खतरा माना गया।
अकबर के खिलाफ मुख्य तर्क
गाय की हत्या पर रोक - पाकिस्तान की स्कूली किताबों में अकबर की आलोचना इस बात को लेकर की जाती है कि उसने हिंदू भावनाओं को ध्यान में रखते हुए गौहत्या पर प्रतिबंध लगाया था।
रामायण और महाभारत का अनुवाद - अकबर ने इन हिंदू ग्रंथों का फारसी में अनुवाद करवाया, जिससे वह मुस्लिम धर्मगुरुओं की नजरों में गिर गए।
शिया मुसलमानों को समर्थन - अकबर ने अपने दरबार में शिया मुसलमानों को नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी, जिसे सुन्नी कट्टरपंथी आज भी गलत मानते हैं।
‘दीन-ए-इलाही’ की स्थापना - अकबर ने एक नया धार्मिक मत चलाया, जो विभिन्न धर्मों के विचारों का समावेश था। पाकिस्तान की किताबों में इसे ‘इस्लाम के साथ धोखा’ बताया गया है।
औरंगजेब पाकिस्तान में क्यों है महान?
इसके ठीक विपरीत, औरंगजेब को पाकिस्तान में एक महान शासक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। वहाँ की इतिहास की किताबों में औरंगजेब को कट्टर मुसलमान और इस्लाम का संरक्षक बताया जाता है। इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं।
इस्लामी कानूनों का पालन - औरंगजेब ने अपने शासनकाल में इस्लामी शरीयत को लागू किया, जो पाकिस्तान के विचारधारा से मेल खाता है।
हिंदू राजाओं के प्रति कठोर रवैया - उन्होंने जज़िया कर दोबारा लागू किया और कई हिंदू मंदिरों को नष्ट किया। पाकिस्तान में इसे इस्लाम की रक्षा के रूप में दिखाया जाता है।
शराब और संगीत पर पाबंदी - औरंगजेब ने अपने शासनकाल में दरबार में संगीत और शराब पर रोक लगाई थी, जिससे वह एक कट्टर धार्मिक शासक के रूप में पहचाने गए।
गजवा-ए-हिंद का समर्थन - पाकिस्तान के कई कट्टरपंथी समूह औरंगजेब को गजवा-ए-हिंद (भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने का विचार) के समर्थक के रूप में देखते हैं।
पाकिस्तान में पढ़ाई जाने वाली इतिहास की किताबें भारतीय इतिहास से अलग दृष्टिकोण रखती हैं। वहाँ के शिक्षाविदों और सरकारी नीतियों ने यह तय किया कि इतिहास को इस्लामिक नजरिए से पढ़ाया जाए, जिससे इस्लामी पहचान मजबूत हो। इसी कारण अकबर, जो कि धार्मिक समन्वय का प्रतीक था, पाकिस्तान में नकारात्मक छवि के साथ पढ़ाया जाता है। वहीं, औरंगजेब, जिसने अपने शासनकाल में इस्लामी कानूनों को कड़ाई से लागू किया, उसे एक आदर्श मुस्लिम नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह दृष्टिकोण पाकिस्तान की धार्मिक और राजनीतिक विचारधारा को मजबूत करने के लिए अपनाया गया।
क्या पाकिस्तान की जनता भी यही सोचती है?
हालांकि, पाकिस्तान में कई बुद्धिजीवी और स्वतंत्र सोच रखने वाले लोग इस नज़रिए से सहमत नहीं हैं। लेकिन वहाँ की शिक्षा प्रणाली और सरकार द्वारा नियंत्रित इतिहास की वजह से आम जनता भी यही सोचती है कि अकबर एक ‘धर्मद्रोही’ था और औरंगजेब एक ‘महान’ इस्लामी शासक था।
भारत और पाकिस्तान के इतिहास में अंतर उनके राजनीतिक और धार्मिक सोच को दर्शाता है। जहाँ भारत में अकबर को एक महान, सहिष्णु और धर्मनिरपेक्ष शासक के रूप में देखा जाता है, वहीं पाकिस्तान में उन्हें इस्लामी पहचान के लिए खतरा बताया जाता है। दूसरी ओर, औरंगजेब को पाकिस्तान में एक आदर्श मुसलमान शासक के रूप में दिखाया जाता है, जबकि भारत में वह एक क्रूर और असहिष्णु शासक के रूप में जाने जाते हैं। इसका मुख्य कारण पाकिस्तान की पाठ्यपुस्तकों में ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाना है। इतिहास की इस भिन्नता को समझना जरूरी है ताकि हम जान सकें कि कैसे राजनीति और धार्मिक विचारधारा इतिहास को प्रभावित करती है।
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