4000 साल पहले वीरान मक्का, कैसे बना मुसलमानों का सबसे पवित्र शहर?
आज, हर साल लाखों मुसलमान हज यात्रा के लिए मक्का आते हैं, सफा और मरवा के बीच दौड़ लगाते हैं और आब-ए-जमजम पीकर आस्था को महसूस करते हैं। आइए, इतिहास के इस रोमांचक सफर में चलते हैं और मक्का के अतीत की गहराइयों को समझते हैं।

हर साल दुनियाभर से लाखों मुसलमान हज यात्रा के लिए मक्का की ओर रुख करते हैं। मक्का, जो इस्लाम का सबसे पवित्र शहर माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह इलाका कभी एक सूखा और निर्जन मैदान था? चार हज़ार साल पहले यहां इंसानी बस्तियों का कोई नामोनिशान तक नहीं था। पर एक पानी की धारा ने इस जगह को हमेशा के लिए बदल दिया। यह कहानी सिर्फ एक शहर की नहीं, बल्कि विश्वास, संघर्ष और आस्था की भी है।
मक्का का इतिहास पैगंबर इब्राहिम और उनके परिवार से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, इब्राहिम को अल्लाह का हुक्म मिला कि वह अपनी पत्नी हाजरा और बेटे इस्माइल को एक सुनसान रेगिस्तानी इलाके में छोड़ दें। यह हुक्म क्यों दिया गया? कैसे यह जगह एक फलते-फूलते शहर में बदल गई? और सबसे अहम बात, काबा में मूर्ति पूजा कब और कैसे शुरू हुई? आइए, इतिहास के इस रोमांचक सफर में चलते हैं और मक्का के अतीत की गहराइयों को समझते हैं।
कैसे हुआ मक्का का जन्म?
करीब 4000 साल पहले, अरब का वह हिस्सा जो आज मक्का कहलाता है, पूरी तरह से वीरान था। दूर-दूर तक बस रेत के ऊँचे-नीचे टीलों के अलावा कुछ नहीं था। न हरियाली थी, न पानी था, और न ही कोई इंसानी आबादी। लेकिन जब पैगंबर इब्राहिम को अल्लाह से आदेश मिला कि वह अपनी पत्नी हाजरा और नवजात बेटे इस्माइल को इसी बंजर भूमि पर छोड़ दें, तब इस वीराने की तक़दीर बदलने वाली थी।
कहते है जब इब्राहिम अपनी पत्नी और बेटे को यहाँ लेकर आए, लेकिन यह जगह किसी भी जीवित इंसान के रहने के लायक नहीं थी। चारों ओर बस जलती हुई रेत थी और सिर पर आग बरसाती सूरज की किरणें। इब्राहिम ने अपने परिवार को थोड़े से खाने और पानी के साथ इस रेगिस्तान में अकेला छोड़ दिया और वापस चले गए। यह फैसला न सिर्फ उनके लिए कठिन था बल्कि हाजरा के लिए भी यह किसी परीक्षा से कम नहीं था।
क्योंकि इब्राहिम के जाने के कुछ समय बाद ही खाने-पीने का सामान खत्म होने लगा था। हाजरा को एहसास हुआ कि उनके पास अब कोई साधन नहीं बचा, जिससे वह अपने बेटे को जिंदा रख सकें। छोटे से इस्माइल की प्यास बढ़ती जा रही थी और वह रोने लगे। हाजरा ने इधर-उधर देखा, लेकिन चारों ओर सिर्फ रेत ही थी। बिलकुल हताश होकर, वह अपने बेटे को छोड़कर पानी की तलाश में निकल पड़ीं। सामने सफा नाम की एक पहाड़ी थी, हाजरा वहाँ भागकर चढ़ीं और दूर-दूर तक नजर दौड़ाई, लेकिन कहीं भी पानी नजर नहीं आया। वह तुरंत दूसरी पहाड़ी मरवा की ओर भागीं और वहाँ से भी चारों ओर देखा, लेकिन कहीं कोई उम्मीद नहीं थी।
इसी तरह, हाजरा ने सफा और मरवा पहाड़ियों के बीच सात बार दौड़ लगाई। उनका दिल उम्मीद और निराशा के बीच झूल रहा था। यह वही घटना है जिसे इस्लाम में "सई" कहा जाता है और जिसे हर साल हज करने वाले यात्री दोहराते हैं।
क्या है आब-ए-जमजम?
जब कोई उम्मीद नहीं बची थी, तभी एक चमत्कार हुआ। हाजरा सफा और मरवा की पहाड़ियों के बीच भाग रही थीं और इधर इस्माइल भूख-प्यास से तड़पते हुए जमीन पर एड़ियां रगड़ रहे थे। तभी अचानक, जहाँ इस्माइल लेटे थे, वहाँ की ज़मीन से एक पानी का झरना फूट पड़ा। यह देखकर हाजरा दंग रह गईं। उन्होंने तुरंत अपने हाथों से पानी को इकट्ठा करना शुरू किया और इसी पानी को "जमजम" कहा गया। यह वही "आब-ए-जमजम" है, जिसे आज भी दुनिया का सबसे पवित्र पानी माना जाता है। पानी के मिलने के बाद, इस निर्जन क्षेत्र में जीवन लौटने लगा। धीरे-धीरे इस्माइल बड़े हुए और यहाँ क़बीलों ने बसना शुरू किया। यहीं से मक्का एक महत्वपूर्ण शहर के रूप में उभरने लगा।
कैसे रखी गई काबा की नींव?
कई सालों बाद, जब इब्राहिम दोबारा इस जगह पर लौटे, तो उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी और बेटा न सिर्फ जिंदा थे बल्कि एक अच्छी जिंदगी जी रहे थे। उन्होंने इसे अल्लाह का चमत्कार माना। इसी समय, अल्लाह ने इब्राहिम को आदेश दिया कि वह इसी जगह पर एक इबादतगाह बनाएं। इब्राहिम और उनके बेटे इस्माइल ने पत्थरों से एक चार कोनों वाली संरचना बनाई, जिसे "काबा" कहा गया। आज यही काबा इस्लाम में सबसे पवित्र स्थल है और यही वह जगह है जहां मुसलमान रोज़ाना नमाज़ के लिए रुख करते हैं।
लेकिन समय बीतने के साथ, इस जगह पर बदलाव आने लगे। लोग धीरे-धीरे अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा करने लगे और काबा के अंदर सैकड़ों मूर्तियाँ रख दी गईं। काबा, जिसे इब्राहिम ने सिर्फ एक ईश्वर की इबादत के लिए बनाया था, अब मूर्ति पूजा का केंद्र बन चुका था। यहाँ तक कि हर साल अलग-अलग क़बीले यहाँ आते और अपने-अपने देवताओं की पूजा करते।
कब हुई पहली हज यात्रा?
वर्षों बाद, इस्लाम के आखिरी पैगंबर हजरत मुहम्मद का जन्म इसी शहर में हुआ। जब इस्लाम फैला, तो अल्लाह ने मुहम्मद साहब को आदेश दिया कि वह काबा को फिर से उसकी असली पवित्र स्थिति में लाएँ। सन् 628 ईस्वी में, पैगंबर मुहम्मद अपने 1400 अनुयायियों के साथ काबा की पहली धार्मिक यात्रा पर निकले, जिसे इस्लाम में "पहली हज यात्रा" कहा जाता है। इसके बाद, जब मक्का इस्लाम के अधिकार में आया, तो मुहम्मद साहब ने काबा से सभी मूर्तियों को हटाकर इसे एक बार फिर से एकेश्वरवाद (तौहीद) का केंद्र बना दिया।
आज, मक्का सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि आस्था, संघर्ष और चमत्कारों की गवाही देने वाला स्थान है। एक समय जो इलाका सूखा और निर्जन था, वह आज दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक केंद्रों में से एक बन चुका है। हर साल लाखों लोग हज के दौरान सफा और मरवा के बीच दौड़ लगाकर हाजरा की पीड़ा को महसूस करते हैं, जमजम के पानी को पीकर आस्था का एहसास करते हैं, और काबा का तवाफ़ (परिक्रमा) करके अल्लाह के सामने अपनी इबादत पेश करते हैं। मक्का की यह यात्रा चार हज़ार साल पहले शुरू हुई थी और अनंत काल तक चलती रहेगी।
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