मृत्यु के बाद भी जारी रहती है अघोरी साधुओं की साधना! 40 दिनों तक नहीं जलाया जाता शव?
अघोरी साधु हमेशा से ही रहस्यमयी और आकर्षक व्यक्तित्व के लिए जाने जाते हैं। इनकी जीवनशैली से लेकर मृत्यु तक, हर पहलू एक गहरे रहस्य से जुड़ा होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब कोई अघोरी साधु दुनिया छोड़ता है तो उसका अंतिम संस्कार कैसे होता है? सामान्य लोगों की तरह इनका दाह संस्कार नहीं किया जाता। बल्कि, इनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में कई गूढ़ और गुप्त विधियों का पालन किया जाता है।

भारत में साधु-संतों की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इन साधुओं में से कुछ लोग सामान्य भक्ति और ध्यान में लीन रहते हैं, तो कुछ लोग तंत्र-मंत्र और अघोर साधना का मार्ग अपनाते हैं। इन्हीं में से एक रहस्यमय संप्रदाय है – अघोरी साधु। इनकी जीवनशैली और मृत्यु के बाद के अनुष्ठान इतने विचित्र और रहस्यमय होते हैं कि आम इंसान के लिए यह सब कल्पना से परे लगता है।
अघोर पंथ और उनका रहस्यमय मार्ग
अघोर संप्रदाय की जड़ें बहुत पुरानी हैं। मान्यता है कि यह परंपरा भगवान शिव के अघोर रूप से जुड़ी हुई है। ये साधु समाज और सामान्य धार्मिक परंपराओं से बिल्कुल अलग होते हैं। अघोरी साधुओं का जीवनमरण, श्मशान, तंत्र साधना और रहस्यमय क्रियाओं से भरा होता है। उनका मानना है कि मृत्यु केवल एक पड़ाव है, मोक्ष की यात्रा का एक हिस्सा। यही कारण है कि अघोरी साधु मृत्यु से नहीं डरते, बल्कि उसे अपने अस्तित्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।
कैसे होता है अघोरी साधु का अंतिम संस्कार?
भारत में जब कोई व्यक्ति मरता है तो उसे दाह संस्कार के लिए श्मशान में जलाया जाता है या फिर उसे दफनाया जाता है। लेकिन अघोरी साधु की मृत्यु के बाद उनका शव जलाया नहीं जाता। उनकी अंतिम यात्रा और संस्कार अन्य साधुओं और आम लोगों से बिल्कुल अलग होते हैं। जब कोई अघोरी साधु संसार छोड़ता है, तो उसके शव को विशेष तरीके से रखा जाता है। शव को चौकड़ी (बैठने की मुद्रा) में उलटा रखा जाता है, यानी सिर नीचे और पैर ऊपर। इसके पीछे एक गहरी तांत्रिक मान्यता होती है – ऐसा करने से मृत साधु की आत्मा जल्दी से परम सत्ता में विलीन हो जाती है। यह प्रक्रिया साधारण व्यक्ति के लिए अजीब हो सकती है, लेकिन अघोरी इसे एक गूढ़ तांत्रिक क्रिया मानते हैं।
40 दिन तक इंतजार क्यों किया जाता है?
अघोरी परंपरा के अनुसार, साधु की मृत्यु के बाद उसके शव को 40 दिनों (सवा माह) तक ऐसे ही रखा जाता है। इस दौरान किसी भी प्रकार से शव को छुआ नहीं जाता। ऐसा करने के पीछे यह मान्यता है कि जब तक शव में कीड़े नहीं पड़ते, तब तक आत्मा पूर्ण रूप से मुक्त नहीं होती। शव के सड़ने और उसमें कीड़े पड़ने को अघोर पंथ में 'माया से मुक्ति' का संकेत माना जाता है। यह प्रतीकात्मक रूप से यह दर्शाता है कि मृत अघोरी ने पूरी तरह से इस दुनिया के बंधनों को त्याग दिया है और उसकी आत्मा अब उच्च चेतना की ओर बढ़ रही है।
40 दिन पूरे होने के बाद शव को बाहर निकाला जाता है और उसे दो भागों में बांटा जाता है। शरीर का निचला भाग जिसे गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। गंगा को मोक्षदायिनी माना जाता है, इसलिए यह विश्वास किया जाता है कि गंगा में बहाने से मृत अघोरी के सारे कर्मों का प्रभाव समाप्त हो जाता है और उसे मोक्ष प्राप्त होता है। वही सिर यानी कपाल वाला भाग सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। अघोरी साधु मृत्यु के बाद भी सिर को बहुत महत्व देते हैं। सिर को साधना के लिए उपयोग में लिया जाता है।
दरअसल अघोरी साधु अपने मृत गुरु या साथी साधुओं के सिर का उपयोग तांत्रिक क्रियाओं में करते हैं। यह कपाल साधना का एक प्रमुख हिस्सा होता है। अघोरी मानते हैं कि सिर में अपार ऊर्जा और रहस्यमय शक्तियाँ समाहित होती हैं, जिसे वे अपनी साधना के माध्यम से जागृत करने का प्रयास करते हैं। कुछ अघोरी साधु कपाल को अपने पास रखते हैं और उसे साधना में शामिल करते हैं, जबकि कुछ एक निश्चित समय तक साधना करने के बाद सिर को गंगा में प्रवाहित कर देते हैं। यह विश्वास किया जाता है कि गंगा में सिर प्रवाहित करने से आत्मा को अंतिम मुक्ति प्राप्त होती है।
क्या है अघोर पंथ का गूढ़ रहस्य?
अघोरी जीवन और मृत्यु को एक ही सिक्के के दो पहलू मानते हैं। वे समाज से अलग रहकर तंत्र-मंत्र और साधना के माध्यम से उच्च चेतना को प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। इनके लिए मृत्यु कोई डरावनी चीज़ नहीं, बल्कि आत्मा की वास्तविक यात्रा की शुरुआत होती है। अघोरी साधु के अंतिम संस्कार की यह परंपरा सिर्फ एक धार्मिक या तांत्रिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह एक दर्शन है जो मृत्यु के बाद भी जीवन के अस्तित्व को स्वीकार करता है।
अघोरी साधुओं की यह परंपरा समाज के सामान्य दृष्टिकोण से बहुत अलग है। आम लोग जहां मृत्यु को दुख और शोक का विषय मानते हैं, वहीं अघोरी इसे एक साधना का मार्ग मानते हैं। यही कारण है कि उनकी जीवनशैली और मृत्यु के बाद के अनुष्ठान आम इंसानों के लिए रहस्यमय और अकल्पनीय लगते हैं। वैसे आपको बता दें कि अघोरी साधु केवल तांत्रिक क्रियाओं के लिए नहीं जाने जाते, बल्कि यह माना जाता है कि वे अद्भुत सिद्धियों के स्वामी होते हैं। कई अघोरी साधु गुप्त विद्या, मंत्र शक्ति और तंत्र साधना के विशेषज्ञ होते हैं। इनकी साधना का मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना होता है, लेकिन यह मार्ग अत्यंत कठिन और रहस्यमय होता है।
अघोरी साधु और उनकी मृत्यु के बाद की यह परंपरा हमें एक नए दृष्टिकोण से जीवन और मृत्यु को समझने का अवसर देती है। यह हमें यह सिखाती है कि मृत्यु केवल एक अंत नहीं है, बल्कि आत्मा की एक नई यात्रा की शुरुआत है।
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