ओंकारेश्वर महादेव मंदिर में रोज़ रात में आते हैं शिव !
Being Ghumakkad की ओंकारेश्वर यात्रा आरंभ हुई मध्यप्रदेश के शहर उज्जैन से। महाकाल की नगरी से ओंकारेश्वर की दूरी करीब 140 किलोमीटर है। इस सफर में हरे-भरे खेत खलिहान मिले, पहाड़ी रास्ते मिले, जंगल, नदियां भी मिले और वो लोग भी मिले जो आस्था के नाम पर नदियों को गंदा करने से बाज़ नहीं आते। ऐसे नज़ारों से रूबरू होते हुए Being Ghumakkad की यात्रा पहुंच गई ओंकारेश्वर। मंदिर से करीब 700 मीटर पहले पार्किंग की व्यवस्था है। यहां कुछ दुकाने हैं, जिनमें पत्थरों को तराशकर शिवलिंग बनाए गए हैं। यहीं पर हमने ठंड के मौसम में चाय की चुस्कियों का आनंद लिया। इस स्थान से करीब 100 मीटर आगे ओमकारेश्वर का प्रवेश द्वार है, जहां से पैदल यात्रा करनी पड़ती है।

ॐकारं बिंदुसंयुक्तं नित्यं ध्यायंति योगिनः।
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः॥
इस शिव षडक्षर स्त्रोतं का अर्थ है।
जो ओमकार के रूप में हमारे हृदय के केन्द्र में रहते हैं
जिस पर योगियों का निरंतर ध्यान रहता है
जो अपने भक्तों की सभी इच्छाओं की पूर्ति करते हैं
और मोक्ष प्रदान करते हैं, ऐसे शिव को मेरा नमन है।
इन्हीं ओमकार महादेव को नमन करने Being Ghumakkad की टीम जा रही है ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग। वही ओंकारेश्वर जिनके चरणों से नर्मदा नदी बहती है। वही ओंकारेश्वर जिनके कण-कण में अद्भुत-अनंत पावनता समाई हुई है। वही ओंकारेश्वर जहां रोज़ रात में महादेव के आने का भरोसा जताया जाता है।
Being Ghumakkad की ओंकारेश्वर यात्रा आरंभ हुई मध्यप्रदेश के शहर उज्जैन से। महाकाल की नगरी से ओंकारेश्वर की दूरी करीब 140 किलोमीटर है। इस सफर में हरे-भरे खेत खलिहान मिले, पहाड़ी रास्ते मिले, जंगल, नदियां भी मिले और वो लोग भी मिले जो आस्था के नाम पर नदियों को गंदा करने से बाज़ नहीं आते। ऐसे नज़ारों से रूबरू होते हुए Being Ghumakkad की यात्रा पहुंच गई ओंकारेश्वर। मंदिर से करीब 700 मीटर पहले पार्किंग की व्यवस्था है। यहां कुछ दुकाने हैं, जिनमें पत्थरों को तराशकर शिवलिंग बनाए गए हैं। यहीं पर हमने ठंड के मौसम में चाय की चुस्कियों का आनंद लिया। इस स्थान से करीब 100 मीटर आगे ओमकारेश्वर का प्रवेश द्वार है, जहां से पैदल यात्रा करनी पड़ती है।
नर्मदा नदी से ओंकारेश्वर मंदिर का दृश्य
पैदल पथ पर दोनों तरफ पूजा सामग्री समेत अनेक प्रकार के रत्नों की दुकानें हैं। साथ ही खेल-खिलौने की दुकानों की भरमार है। इस पथ पर दूर-दूर से आए अलग-अलग भाव-भंगिमाओं वाले श्रद्धालु दिख जाएंगे। यहां से करीब 200 मीटर पैदल चलकर आता है ममलेश्वर सेतु। ये सेतु नर्मदा नदी को पार कर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग पहुंचने का रास्ता है। यहां से नर्मदा का विहंगम दृश्य दिखता है। नदी में घूमती अनेकों बोट नज़र आती हैं। इन नावों को देखकर हमने सोचा क्यों न यात्रा बोट से की जाए, इस बहाने कुछ और हिस्से भी एक्सप्लोर हो जाएंगे। नाव वाले से प्रति व्यक्ति 100 रुपए में बात हुई। और कुल मिलाकर डील 1000 रुपए में फाइनल हो गई। जिसके बाद हम उस घाट की ओर बढ़ चले जहां से नाव श्रद्धालुओं को भोलेनाथ के द्वार तक ले जाती है।
ज्योतिर्लिंग के दर्शनों से पहले नर्मदा का नाविक हमें उस स्थान की ओर ले चला, जहां नर्मदा नदी पर बांध बना हुआ है। जहां पर नर्मदा और कावेरी का संगम होता है। जहां से विंध्यांचल पर्वतमाला बिल्कुल सामने खड़ी हुई प्रतीत होती है। दोनों नदियों के बीचोंबीच एक द्वीप है। जिसे मान्धाता पर्वत, शिवपुरी द्वीप, मान्धाता द्वीप या मान्धाता दुर्ग भी कहते हैं। यहीं परमार राजाओं के बनाए गये किले की दीवार व द्वार हैं।
नर्मदा नदी से ऐसे ही भव्य और दिव्य नज़ारे दिखाते हुए नाव आगे बढ़ी। लेकिन हम नदी में जिस किसी भी तरफ रहे, हरदम हमारी नज़र ओंकारेश्वर महादेव की तरफ ही गड़ी रही, कि वो अब दिखेंगे तब दिखेंगे। कुछ देर तक नदी के अलग-अलग कोनों में घूमते हुए आखिरकार टीम Being Ghumakkad को नाविक ने ओंकारेश्वर घाट पर उतार ही दिया। यहां से पैदल चलते हुए दोनों तरफ फूल बेचती महिलाएं दिखाई दीं। साथ ही प्रसाद की दुकाने भी। इस हिस्से से श्रद्धालुओं और दुकानदारों की भीड़ अचानक आपसे टकराती है। क्योंकि अब आप ओंकारेश्वर परिसर में पहुंच चुके होते हैं।
यहां से यात्रा अनगिनत सीढ़ियों से गुजरते हुए आगे बढ़ती है। लेकिन 50 मीटर चलते ही अचानक कदम ठहर से जाते हैं। यहां नज़र आती है एक गुफा। माना जाता है कि 1200 साल पहले आदिगुरु शंकराचार्य के साथ उनके गुरु ने इस स्थान पर तपस्या की थी। Being Ghumakkad की टीम इस गुफा के अंदर पहुंची तो देखा अंदर सिमेंट से निर्माण कार्य करवाया गया है। साथ ही शंकराचार्य समेत कुछ मूर्तियां स्थापित की गई हैं। पहाड़ से रिसते पानी की वजह से यहां काफी नमी रहती है। कुछ पुराने स्तम्भ भी यहां नज़र आते हैं। अंदर से दाईं तरफ बढ़ने पर गुफा का हिस्सा गहरा होता जाता है। गुफा में आगे जाने का साहस कोई नहीं जुटा पाता। ये गुफा कांची कामकोटि पीठ कांचीपुरम के अधिकार में है।
इस स्थान से आगे बढ़ने पर कुछ औऱ छोटे-बडे़ मंदिर मिलते हैं। साथ ही भक्त अब पंक्तियों वाले इलाके में पहुंच जाते हैं। श्रद्धालुओं की भीड़ को काबू में करने के लिए यहां से कई कतारों की व्यवस्था की गई है। इन क़तारों की शुरूआत होते ही सबसे पहले बाहर मिलते हैं सफेद संगमरमर से बने नंदी देवता। इस स्थान पर पहुंचकर लगता है ओंकारेश्वर के गर्भगृह में पहुंच गए। माना जाता है यहीं पर ऊं शब्द की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के मुख से हुई थी। इसलिए हर धार्मिक कार्यों में ऊं शब्द का उच्चारण किया जाता है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग ऊंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है। इसलिए इसे ओंकारेश्वर महादेव कहा जाता है। श्रद्धालु जब तक सभी तीर्थों का जल लाकर ओंकारेश्वर महादेव में नहीं चढ़ाते उनकी तीर्थ यात्राएं अधूरी मानी जाती हैं।
अपनी यात्रा को पूरा करने के लिए इस स्थान से भक्त बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं क्योंकि यहां बस चंद कदमों के बाद ज्योतिर्लिंग के दर्शन हो जाते है। यहां ज्योतिर्लिंग की दीवारों और स्तम्भों में की गई नक्काशी दिखाई देती है। नक्काशी देखकर प्रतीत होता है ये उत्तर भारतीय कला में बना है। इस हिस्से को देखकर पता लगता है मंदिर की पौराणिकता, हज़ारों साल से महादेव के प्रति बढ़ती जा रही विश्वास की अनंत गाथा कितनी बुलंद है।
ओंकारेश्वर मंदिर की पौराणिक कथा
एक कथा के मुताबिक सूर्यवंशी राजा मान्धाता ने कठोर तपस्या करके यहां महादेव को प्रसन्न किया था। राजा मान्धाता के नाम पर ही इस पर्वत शिखर का नाम मान्धाता हो गया। इसलिए ओंकारेश्वर नगरी का मूल नाम भी मान्धाता ही है। माना जाता है ओंकारेश्वर में कुल 68 तीर्थ हैं, और यहां 33 कोटि देवी-देवता परिवार समेत निवास करते हैं। एक कथा के अनुसार मान्धाता की तपस्या से खुश होकर शिव यहां ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए। मौजूदा मंदिर का निर्माण किसने और कब किया इसकी कोई जानकारी नहीं है। जबकि मध्ययुग की बात करें तो मांधाता ओंकारेश्वर पर धार के परमार, मालवा के सुल्तान, ग्वालियर के सिंधिया जैसे राजाओं का शासन रहा। माना जाता है कि ये स्थान 1894 में अंग्रेजों के अधीन हो गया। इतिहास के झरोखों से अभिभूत होते-होते सामने आ जाते हैं ओंकारेश्वर महादेव |
ओंकारेश्वर महादेव की अद्भुत-अकल्पनीय तस्वीर को देखकर लोग तृप्त हो जाते हैं। हमारे साथ भी यही हुआ। लेकिन यहां पर पुजारी और मंदिर प्रशासन के लोग ज्यादा देर किसी को रुकने नहीं देते। महादेव के सामने सिर झुकाते हुए लोग आगे बढते जाते हैं। हम भी आगे बढ़ें उससे पहले महादेव के दर्शनों का पूरा नियम जान लीजिए।
रात 9:30 बजे से सुबह 5 बजे से पहले तक मंदिर भक्तों के लिए बंद रहता है।
सुबह 4:30 बजे से 5 बजे तक महादेव की मंगल आरती एवं नैवेद्य भोग का समय है।
सुबह 5 बजे से दोपहर 12:20 तक भगवान के मंगल दर्शन का वक्त है।
12:20 से 1:15 तक भोलेनाथ को मध्यान्ह कालीन भोग दिया जाता है।
दोपहर 1:15 से शाम 4:00 बजे तक महादेव के मध्यान्ह दर्शन किए जाते हैं।
शाम 4 बजे से 4:15 बजे तक सायंकालीन श्रृंगार किया जाता है।
शाम 4:15 बजे से रात 8:30 बजे तक भगवान के श्रृंगार दर्शन का समय है।
रात 8:30 बजे से 9 बजे तक शय़न श्रृंगार एवं आरती की जाती है।
जबकि सबसे आखिर में रात 9 बजे से 9:30 बजे तक शयन श्रृंगार दर्शन किए जाते हैं।
ओंकारेश्वर महादेव में रात की आरती के बाद हर रोज़ गर्भ ग्रह के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं। इसी दौरान यहां चौसर-पासे बिछाए जाते हैं। झूला और बिस्तर भी लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है सुबह जब मंदिर के द्वार खुलते हैं तो चौसर-पासे बिखरे मिलते हैं। जिस चादर में चौसर-पासे रखे होते हैं उसमें सिलवटें नज़र आती हैं। शिव कब और किस रास्ते से यहां आते हैं, कोई नहीं जान सका |
शिव के स्वयंभू रूप के इस स्थान में स्थापित होने को लेकर और भी कई कथाएं प्रचलित हैं। उन्हीं कथाओं से जुड़ा हुआ ओंकारेश्वर का एक दूसरा रूप नर्मदा के दूसरे हिस्से में ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के सामने राजा मांधाता की गद्दी बिछाई गई है। यहां से ऊपर बढ़ने पर ऊंकार पार्वतीश्वर महादेव विराजे हैं। यहां पति-पत्नी के जोड़े की पूजा करने की परंपरा है। इस स्थान से ऊपर महाकालेश्वर मंदिर है। यहां कम लोग ही जाते हैं, ज्यादातर श्रद्धालु ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर नीचे उतर जाते हैं। जिन भक्तों को जानकारी है, वो ऊपर आकर महादेव के दर्शन करते हैं, नंदी के कान में मन की मुराद पढ़ते हैं।
इस स्थान पर अक्सर का दृश्य ही अद्भुत है। मंदिर की नक्काशी के अलावा समूचा ओंकारेश्वर क्षेत्र यहां से नज़र आता है। शिव का एक बड़ा त्रिशूल यहां सिंबोलिक रूप में लगाया गया है। जिसके नीचे बैठकर भक्त तस्वीर खिंचवाने से नहीं चूकते। अभी ओंकारेश्वर के दर्शन पूरे नहीं होते। अब हम आपको उस स्थान पर ले चलते हैं। जहां कोई नहीं जा सकता। ये स्थान है मंदिर का सबसे ऊपरी शिखर।
Being Ghumakkad ने ओंकारेश्वर दर्शन कर अपनी यात्रा को विराम दे दिया। लेकिन अगर आप पूरा समय लेकर जाएं तो यहां बहुत कुछ देखने और भक्ति में रमने के लिए मिलेगा। ओंकारेश्वर में ओंकार पर्वत की परिक्रमा करने की मान्यता है। ये पथ लगभग 7 किलोमीटर लंबा है। अब पथ का रास्ता सीमेंट का बना दिया गया है। परिक्रमा पथ पर ऋण मुक्तेश्वर महादेव, गौरी सोमनाथ मंदिर, रामकृष्ण मिशन साधना कुटीर, शिव प्रतिमा मंदिर, पाताली हनुमान मंदिर, ओंकार मठ जैसे दिव्य स्थान शामिल मिलते हैं। ओंकारेश्वर आने का सबसे अच्छा माध्यम रोड और रेल नेटवर्क है। सड़क मार्ग से ओम्कारेश्वर इंदौर, खंडवा, उज्जैन से जुड़ा हुआ है। यहां से 12 किलोमीटर दूर मोरटक्का का रेलवे स्टेशन है। अगर आप प्लेन से यहां पहुंचना चाहते हैं तो इंदौर नज़दीक का स्टेशन है। जो करीब 75 किलोमीटर दूर है। अप्रैल से जून तीन महीने छोड़कर वर्ष भर यहां का मौसम यात्रा के लिए अच्छा रहता है |
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